पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी तीजन बाई- डुमन लाल ध्रुव

भारत की सांस्कृतिक पहचान उसकी विविध लोककलाओं, लोकगीतों और लोकपरंपराओं में निहित है। देश के प्रत्येक राज्य ने अपनी विशिष्ट लोकसंस्कृति के माध्यम से भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया है। छत्तीसगढ़ भी ऐसी ही सांस्कृतिक धरोहरों से सम्पन्न प्रदेश है। यहां की लोककलाओं में पंथी, राऊत नाचा, सुवा, करमा, ददरिया, भरथरी और पंडवानी जैसी विधाओं ने जनजीवन को गहराई से प्रभावित किया है। इनमें पंडवानी केवल एक लोकगायन शैली नहीं  बल्कि महाभारत की कथाओं को संगीत, अभिनय और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से जीवंत कर देने वाली अद्भुत लोकनाट्य परंपरा है।

इस लोककला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय जिस महान कलाकार को जाता है वह है तीजन बाई। उन्होंने अपने अद्भुत स्वर, सशक्त अभिनय, प्रभावशाली संवाद और विलक्षण मंच प्रस्तुति से पंडवानी को विश्वभर में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि लोककला किसी क्षेत्र की सीमाओं में बंधी नहीं होती  वह सम्पूर्ण मानवता की सांस्कृतिक धरोहर होती है।

तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना, आत्मविश्वास और निरंतर परिश्रम का प्रेरक उदाहरण है। अत्यंत साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर विश्व के अनेक देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का गौरव बढ़ाया। वे केवल एक कलाकार नहीं थी  छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की सशक्त प्रतीक थी।

     ’’पंडवानी’’ शब्द दो शब्दों – श्पांडवश् और श्वाणीश् से मिलकर बना है अर्थात पांडवों की कथा का गायन। इसमें मुख्य रुप से महाभारत के प्रसंगों का गायन और अभिनय किया जाता है। कलाकार केवल गीत नहीं गाता वह पात्रों के संवाद, युद्ध, भावनाएं और घटनाओं का अभिनय भी करता है। इस प्रकार श्रोता स्वयं को महाभारत के युग में उपस्थित अनुभव करते हैं।

पंडवानी की दो प्रमुख शैली है – वेदमती शैली और कापालिक शैली । छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक कापालिक शैली में केवल पुरुष कलाकार ही प्रस्तुति देते थे क्योंकि इसे कठिन, ऊर्जावान और अभिनय प्रधान शैली माना जाता था। किंतु तीजन बाई ने इस परंपरा को बदल दिया। वे पहली महिला बनी जिन्होंने इस शैली को अपनाकर उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी ग्राम में हुआ। उनके पिता का नाम झुनुकलाल पारधी तथा माता का नाम सुखबती था। उनका परिवार आर्थिक रुप से अत्यंत साधारण था। ग्रामीण परिवेश में बचपन बीता, जहां लोकगीत, लोककथाएं और धार्मिक परंपराएं जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी।

बचपन से ही उन्हें अपने नाना बृजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनने का अवसर मिला। नाना स्वयं पंडवानी के अच्छे जानकार थे। जब वे महाभारत के प्रसंग सुनाते तब बालिका तीजन उन्हें अत्यंत ध्यान से सुनती और उसी प्रकार दोहराने का प्रयास करती। धीरे-धीरे उन्हें अनेक प्रसंग कंठस्थ हो गए। परिवार और समाज ने प्रारंभ में उनके इस शौक को विशेष महत्व नहीं दिया क्योंकि उस समय लड़कियों का मंच पर जाकर लोककला प्रस्तुत करना सामान्य बात नहीं थी। फिर भी तीजन बाई ने अपनी रुचि और लगन को कभी नहीं छोड़ा। तीजन बाई की प्रतिभा को देखकर प्रसिद्ध लोकगायक उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें पंडवानी की विधिवत शिक्षा दी। उन्होंने केवल गायन ही नहीं मंच संचालन, संवाद, अभिनय, स्वर, लय और भावाभिव्यक्ति की बारीकियां भी सिखाई। गुरु के मार्गदर्शन में तीजन बाई ने अथक अभ्यास किया। वे घंटों तक महाभारत के प्रसंगों का अभ्यास करती। उनकी स्मरण शक्ति इतनी अद्भुत थी कि वे लंबे-लंबे प्रसंग बिना किसी लिखित पाठ के प्रस्तुत कर लेती थी। उनकी आवाज में गहराई, ओज और करुणा का अद्भुत संगम था। यही कारण था कि जब वे भीष्म, अर्जुन, भीम, द्रौपदी या श्रीकृष्ण के संवाद प्रस्तुत करती तो दर्शक भाव-विभोर हो जाते।

लगभग तेरह वर्ष की आयु में तीजन बाई ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी प्रस्तुत की। यह प्रस्तुति उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। दर्शकों ने उनके गायन और अभिनय की भरपूर सराहना की। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यही बालिका आगे चलकर भारत की सबसे प्रसिद्ध लोककलाकारों में गिनी जाएगी। उनकी पहली प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा किसी आयु, लिंग या सामाजिक स्थिति की मोहताज नहीं होती। सफलता का मार्ग आसान नहीं था। सामाजिक रूढ़ियां, आर्थिक कठिनाइयां और पारिवारिक चुनौतियां उनके सामने थी। कई लोगों ने यह कहते हुए उनका विरोध किया कि महिलाओं को मंच पर खड़े होकर अभिनय नहीं करना चाहिए। परंतु तीजन बाई ने इन बाधाओं को अपनी प्रगति का अवरोध नहीं बनने दिया। उन्होंने निरंतर अभ्यास किया, छोटे-छोटे आयोजनों में प्रस्तुति दी और अपनी प्रतिभा के बल पर लोगों का विश्वास जीता। यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी शक्ति बना।

पहली सार्वजनिक प्रस्तुति के बाद तीजन बाई के जीवन में संघर्ष का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। उनकी प्रतिभा की चर्चा गांव-गांव तक पहुंचने लगी  किंतु समाज का एक वर्ग अभी भी इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि कोई महिला मंच पर खड़े होकर अभिनय करते हुए पंडवानी प्रस्तुत करे। उस समय महिलाओं के लिए वेदमती शैली में बैठकर गायन करना ही परंपरा मानी जाती थी  जबकि कापालिक शैली में प्रस्तुति केवल पुरुष कलाकार देते थे। लेकिन तीजन बाई ने परंपराओं की सीमाओं को चुनौती दी। उनका विश्वास था कि कला का मूल्य कलाकार की प्रतिभा से होता है  न कि उसके स्त्री या पुरुष होने से। उन्होंने साहसपूर्वक कापालिक शैली को अपनाया और मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुति देना प्रारंभ किया। यह केवल एक कलात्मक परिवर्तन नहीं था  भारतीय लोककला के इतिहास में सामाजिक परिवर्तन का भी महत्वपूर्ण क्षण था। कापालिक शैली में कलाकार पूरे मंच पर गतिशील रहता है। वह केवल गायक नहीं होता  अभिनेता, कथावाचक और संवादकार भी होता है। प्रत्येक पात्र के अनुसार स्वर, भाव, चाल और मुद्रा बदल जाती है। कलाकार कभी भीम बनता है, कभी अर्जुन, कभी द्रौपदी, कभी श्रीकृष्ण और कभी दुर्याेधन। तीजन बाई ने इस शैली को अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता से और अधिक प्रभावशाली बना दिया। उनके हाथ में रहने वाला साधारण तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी रथ का ध्वज और कभी द्रौपदी के केशों का प्रतीक। बिना किसी बड़े मंच-सज्जा या महंगे उपकरण के वे केवल अपनी आवाज, अभिनय और कल्पनाशक्ति से महाभारत का पूरा दृश्य उपस्थित कर देती थी।

दर्शक केवल कथा नहीं सुनते थे  उसे जीने लगते थे। युद्ध के दृश्य में उनकी आवाज वीर रस से भर उठती, करुण प्रसंगों में आंखें नम हो जाती और श्रीकृष्ण के संवादों में अद्भुत शांति का अनुभव होता। तीजन बाई मानती थीं कि कलाकार का सबसे बड़ा धन उसका निरंतर अभ्यास है। वे प्रतिदिन घंटों तक रियाज करती थी। महाभारत के विभिन्न प्रसंगों का अभ्यास, स्वर-साधना, संवादों का अभ्यास और मंच संचालन ये सब उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे। उन्होंने कभी यह नहीं माना कि प्रसिद्धि प्राप्त हो जाने के बाद अभ्यास की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। वे अंतिम समय तक स्वयं को एक विद्यार्थी ही मानती रही। यही विनम्रता और अनुशासन उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाता है।

तीजन बाई के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया  जब प्रसिद्ध रंगकर्मी ने उनकी प्रस्तुति देखी। वे उनकी असाधारण प्रतिभा से अत्यंत प्रभावित हुए। हबीब तनवीर ने समझ लिया कि यह कलाकार केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित रहने वाली नहीं है  पूरे भारत और विश्व को अपनी कला से प्रभावित कर सकती है। उन्होंने तीजन बाई को बड़े मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद तीजन बाई को राष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगीत समारोहों और प्रतिष्ठित आयोजनों में आमंत्रित किया जाने लगा। जहां भी वे प्रस्तुति देती  वहां दर्शक उनकी कला के प्रशंसक बन जाते। तीजन बाई को भारत के अनेक राष्ट्रीय आयोजनों में अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिला। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री  सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं और विशिष्ट अतिथियों के समक्ष पंडवानी प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति देखकर सभी आश्चर्यचकित रह जाते थे कि एक लोककलाकार केवल एक तंबूरा और अपनी आवाज के सहारे हजारों दर्शकों को कई घंटों तक बांधे रख सकती है। यहीं से पंडवानी को राष्ट्रीय स्तर पर नई प्रतिष्ठा मिली और लोककला के प्रति लोगों का दृष्टिकोण भी बदला।

राष्ट्रीय सफलता के बाद तीजन बाई ने अनेक देशों की यात्राएं की। उन्होंने एशिया, यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों में भारतीय लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व किया। भले ही अधिकांश विदेशी दर्शक हिन्दी या छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं समझते थे लेकिन उनके अभिनय, भाव-भंगिमा और स्वर की शक्ति भाषा की सीमाओं से कहीं आगे पहुंच जाती थी। दर्शक कथा का भाव सहज ही समझ लेते थे। उनकी प्रस्तुतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची कला किसी अनुवाद की मोहताज नहीं होती। तीजन बाई केवल महान कलाकार ही नहीं थी  महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल भी थी। उन्होंने उस समय सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी  जब महिलाओं के लिए सार्वजनिक मंचों पर अभिनय करना सहज नहीं माना जाता था। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि यदि प्रतिभा, परिश्रम और आत्मविश्वास हो  तो कोई भी बाधा सफलता के मार्ग में स्थायी नहीं बन सकती। आज अनेक युवा महिला कलाकार पंडवानी और अन्य लोककलाओं में जो सम्मानपूर्वक कार्य कर रही हैं  उसमें तीजन बाई के संघर्ष और साहस का महत्वपूर्ण योगदान है।

जीवन भर उन्होंने लोककला को केवल पेशा नहीं माना अपनी साधना समझा। वे कहती थी कि पंडवानी केवल महाभारत की कथा नहीं जीवन के आदर्शों, धर्म, न्याय, साहस और मानवता का संदेश देने वाली परंपरा है। उनकी प्रत्येक प्रस्तुति दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का भी संदेश देती थी। यही कारण है कि वे केवल कलाकार नहीं भारतीय संस्कृति की सशक्त प्रतिनिधि बन गई।

तीजन बाई का नाम भारतीय लोककला के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्होंने केवल पंडवानी का गायन ही नहीं किया  उसे जीवंत अभिनय, प्रभावशाली संवाद और अद्भुत मंचीय अभिव्यक्ति के माध्यम से एक नई ऊंचाई प्रदान की। उनकी कला में संगीत, साहित्य, नाट्य और लोकसंस्कृति का ऐसा अद्भुत समन्वय दिखाई देता था जो विरले कलाकारों में ही देखने को मिलता है।

तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी ओजपूर्ण और प्रभावशाली आवाज थी। उनकी वाणी में वीर रस का उत्साह, करुण रस की संवेदना, भक्ति का समर्पण और श्रृंगार की कोमलता सभी भाव सहज रुप से प्रकट होते थे। वे महाभारत के पात्रों के अनुसार अपने स्वर और भाव बदल लेती थी। जब वे भीम का चरित्र प्रस्तुत करती तो उनकी आवाज  में शक्ति और गर्जना सुनाई देती थी। अर्जुन के प्रसंगों में वीरता और आत्मविश्वास झलकता था। द्रौपदी के चीरहरण का वर्णन करते समय उनकी करुण पुकार श्रोताओं की आंखें नम कर देती थी  जबकि श्रीकृष्ण के संवादों में गंभीरता, करुणा और आध्यात्मिक तेज का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था। तीजन बाई का अभिनय उनकी गायकी जितना ही प्रभावशाली था। वे मंच पर किसी अभिनेता की तरह प्रत्येक पात्र को जीवंत कर देती थी।

उनके हाथ में रहने वाला तंबूरा केवल वाद्य यंत्र नहीं था  उनकी कल्पना का माध्यम था। कभी वही तंबूरा भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुर्याेधन की गदा, कभी रथ का ध्वज और कभी द्रौपदी के खुले केशों का प्रतीक बन जाता था। उनकी आंखों की भाषा, हाथों की गति, चेहरे के भाव और शरीर की मुद्राएं कथा को सजीव बना देती थी। यही कारण था कि दर्शक केवल सुनते नहीं थे स्वयं को महाभारत की घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षी अनुभव करते थे।

तीजन बाई ने छत्तीसगढ़ी लोकभाषा को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। उन्होंने सिद्ध किया कि भाषा की मिठास, लोकजीवन की सरलता और भावों की सच्चाई किसी भी कला को विश्वव्यापी बना सकती है। विदेशों में प्रस्तुति देते समय अनेक दर्शक छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं समझते थे  फिर भी वे उनके अभिनय और स्वर की शक्ति से गहराई से प्रभावित होते थे। इससे यह सिद्ध हुआ कि कला की भाषा सार्वभौमिक होती है। तीजन बाई जहां भी गई अपने साथ भारत की सांस्कृतिक परंपरा, महाभारत की कथा और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति लेकर गई। उन्होंने दुनिया को बताया कि भारत की लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं  हमारी सांस्कृतिक स्मृति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना की धरोहर हैं। उनकी प्रस्तुतियों ने अनेक विदेशी विद्वानों, कलाकारों और शोधकर्ताओं को भारतीय लोककला का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। अपने असाधारण योगदान के लिए तीजन बाई को अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। पद्मश्री (1987) लोककला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)  भारतीय रंगमंच एवं लोकसंगीत में उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिए। पद्मभूषण (2003) भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में विशिष्ट योगदान के लिए। फुकुओका पुरस्कार (जापान) (2018) एशिया की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने के लिए। पद्मविभूषण (2019)  भारत का दूसरा सर्वाेच्च नागरिक सम्मान जो उनकी आजीवन कला-साधना का राष्ट्रीय सम्मान था। मानद डी.लिट. उपाधि  बिलासपुर विश्वविद्यालय (वर्तमान अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय) द्वारा प्रदान की गई। इन सम्मानों ने केवल तीजन बाई का सम्मान नहीं बढ़ाया  छत्तीसगढ़ की लोककला और पंडवानी को भी राष्ट्रीय एवं वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई।

तीजन बाई ने अनेक युवा कलाकारों को पंडवानी सीखने और लोककलाओं के संरक्षण के लिए प्रेरित किया। वे हमेशा कहती थी कि कला तभी जीवित रहती है जब नई पीढ़ी उसे अपनाती है। उन्होंने अनेक शिष्यों को प्रशिक्षण दिया और मंच पर अवसर भी उपलब्ध कराए। उनके कारण आज पंडवानी केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है  भारत के विभिन्न राज्यों और विदेशों में भी जानी-पहचानी लोककला बन चुकी है। आधुनिकता और तकनीक के इस युग में अनेक लोककलाएं विलुप्त होने के संकट का सामना कर रही हैं। ऐसे समय में तीजन बाई का योगदान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने सिद्ध किया कि यदि कलाकार अपनी परंपरा से जुड़ा रहे और उसे समय के अनुरुप प्रस्तुत करे तो लोककला कभी समाप्त नहीं होती। उन्होंने पंडवानी को केवल संरक्षित ही नहीं किया  उसे नई पीढ़ी के लिए आकर्षक और प्रासंगिक भी बनाया। यही उनकी सबसे बड़ी सांस्कृतिक उपलब्धि है।

तीजन बाई का जीवन हमें यह सिखाता है कि प्रतिभा, परिश्रम, अनुशासन और आत्मविश्वास के बल पर साधारण परिस्थितियों से उठकर भी विश्वभर में सम्मान प्राप्त किया जा सकता है। वे भारतीय लोकसंस्कृति की जीवित पहचान थी। उनके कारण लाखों लोगों ने पहली बार पंडवानी को जाना और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का महत्व समझा। उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा, गौरव और सांस्कृतिक चेतना का स्रोत बनी रहेगी।

लोककला की दुनिया में अपार प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद भी तीजन बाई का जीवन अत्यंत सादा और सहज रहा। वे ग्रामीण संस्कृति, लोकभाषा और अपनी जड़ों से कभी अलग नहीं हुई। मंच पर वे जितनी ऊर्जावान और प्रभावशाली दिखाई देती थी मंच के बाहर उतनी ही सरल, विनम्र और आत्मीय थी। उनका मानना था कि कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका अहंकार नहीं  उसका निरंतर अभ्यास और जनता का प्रेम होता है। यही कारण था कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद भी उन्होंने स्वयं को लोककला की साधक ही माना।

तीजन बाई के लिए पंडवानी केवल कला नहीं थी  जीवन का धर्म थी। वे महाभारत के पात्रों को केवल अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत नहीं करती थी  उनके आदर्शों को अपने जीवन में भी उतारने का प्रयास करती थी। वे मुझे प्रायः बताया करती थी कि महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है  सत्य, धर्म, न्याय, कर्तव्य, साहस और मानवता का महान ग्रंथ है। इसलिए उनकी प्रत्येक प्रस्तुति केवल मनोरंजन नहीं जीवन-मूल्यों का संदेश भी देती थी। तीजन बाई ने ऐसे समय में अपनी पहचान बनाई  जब लोकमंच पर महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी। उन्होंने सामाजिक रुढ़ियों का सामना किया, आलोचनाएं सुनी, आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया लेकिन कभी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटी। उनकी सफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता। आज देश की अनेक महिला लोककलाकार उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। उन्होंने भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण का एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत किया। यदि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की चर्चा होगी तो तीजन बाई का नाम सदैव प्रमुखता से लिया जाएगा। उन्होंने पंडवानी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की भाषा, लोकगीत, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक गौरव को विश्व मंच तक पहुंचाया। उनके कारण लाखों लोगों ने पहली बार छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक समृद्धि को जाना। वे वास्तव में राज्य की सांस्कृतिक पहचान की जीवित प्रतीक थी।जीवन के अंतिम वर्षों में भी तीजन बाई कला से जुड़ी रही। स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने लोककला के संरक्षण और नई पीढ़ी को प्रेरित करने का कार्य नहीं छोड़ा। 5 जुलाई 2026 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय लोककला जगत का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। यह केवल छत्तीसगढ़ की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की सांस्कृतिक क्षति थी।

उनके निधन का समाचार मिलते ही देशभर के कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतज्ञों, रंगकर्मियों और कला-प्रेमियों ने गहरा शोक व्यक्त किया। अनेक सांस्कृतिक संस्थाओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि तीजन बाई जैसी कलाकार सदियों में जन्म लेती हैं। महान कलाकार अपने जीवनकाल तक ही सीमित नहीं रहते  उनकी कला और विचार उन्हें अमर बना देते हैं। तीजन बाई भी ऐसी ही महान विभूति हैं।

उन्होंने पंडवानी को गांवों की चौपाल से उठाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। आज उनके शिष्य, उनके प्रशंसक और नई पीढ़ी के कलाकार उनकी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी प्रस्तुतियों की रिकॉर्डिंग, शोधकार्य और सांस्कृतिक अध्ययन आने वाले वर्षों तक भारतीय लोककला के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे। उनकी विरासत हमें यह सिखाती है कि यदि अपनी संस्कृति पर विश्वास हो और निरंतर साधना की जाए तो स्थानीय लोककला भी विश्व स्तर पर सम्मान प्राप्त कर सकती हैं।

हे पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी आपने अपनी वाणी से महाभारत के पात्रों को जीवंत किया, लोककला को विश्व मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई और छत्तीसगढ़ का गौरव पूरे संसार में फैलाया। आपकी साधना, आपका संघर्ष और आपकी अमर कला सदैव हमारी प्रेरणा बनी रहेगी। आपका जीवन भारतीय संस्कृति के इतिहास का उज्ज्वल अध्याय है। आपकी स्मृतियां, आपकी आवाज और आपकी सांस्कृतिक विरासत युगों-युगों तक जीवित रहेंगी।

– डुमन लाल ध्रुव

मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)

पिन – 493773 मोबाइल – 9424210208

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