’अपनी पोती को कैसी शिक्षा दे रहे हैं वर्मा जी? हम जैसे विद्वानों को बुद्धू कहना कहाँ तक उचित है? कैसे संस्कार दिए हैं उसको?’ – एक विद्वान ने अपने अहंकार पर मरहम-पट्टी लगाते हुए मानो मेजबान वर्मा जी के ऊपर गोली ही दाग दी! पुरस्कार चयन समिति की बैठक में अनजाने ही असहज स्थिति पैदा हो गई थी।’
निर्णायक समिति के छह विद्वान साहित्यकारों को ड्राइंग रूम में गहन विचार-विमर्श करते हुए दो घंटे हो गए थे, मगर वे कोई फैसला नहीं ले पा रहे थे। विषय भी गहन-गंभीर था कि पाँच लाख रुपये और ताम्रपत्र किस साहित्यकार को प्रदान किया जाए? पिछली बैठक में छंटनी के बाद अंत में दो गद्य साहित्यकार ही शेष बचे थे- पाण्डेय जी और दीवान जी। उन्हीं में से एक का चयन करना था। निर्णायक समिति के सभी छह मनीषी साहित्यकार उनकी कृतियों का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे। वैसे देखा जाए तो दोनों के लेखन में कोई कमी नहीं थी। दोनों कहानी और उपन्यास लेखन में सिद्धहस्त थे। एक पुराने जमाने के मगर प्रेमचंद के नाम से मशहूर थे, तो दूसरे प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध लेखक थे। इस समय चयन समिति के तीन सदस्य पाण्डेय जी के पक्ष में तो तीन दीवान जी के पक्ष में थे। चयन समिति के अध्यक्ष रामनाथ पशोपेश में थे, मगर वे चाहते थे कि पुरस्कार का निर्णय बिना पक्षपात के योग्यता के आधार पर ही हो। दोनों साहित्यकारों को संयुक्त रूप से पुरस्कार देना संभव नहीं था क्योंकि नियमावली में यह पुरस्कार प्रदेश के केवल एक ही साहित्यकार को देने का प्रावधान था।
चयन समिति के संयोजक वर्मा जी के बंगले के बाहर फैसले के इंतजार में दोनों साहित्यकारों के सैकड़ों समर्थक डटे थे, मानो चुनाव का परिणाम घोषित होने वाला हो! पुरस्कार की राशि बड़ी थी, वैसे ही दोनों साहित्यकारों का कद भी बड़ा था। प्रगतिशील गुट और स्थानीय गुट में गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण पुरस्कार की घोषणा के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकलना तय था। सेठ रावलमल की स्मृति में प्रति वर्ष दिया जाने वाला यह पुरस्कार प्रदेश में सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान माना जाता है।
ड्राइंग रूम में नौ बरस की निकिता बार-बार आ-जा रही थी। आखिरकार निकिता के सब्र का बाँध टूट ही गया। उसने शिकायती लहजे में कहा- “क्या दादाजी? आप लोग दो घंटे से यहाँ बुद्धू जैसे बैठे एक ही विषय पर चर्चा कर रहे हैं! यहाँ से आप लोग कब जाएँगे? मुझे टीवी पर एक साइंस फीचर फिल्म देखनी है!”
”हम लोग एक फैसला नहीं ले पा रहे हैं बेटी…” – वर्मा जी की बात अधूरी ही रह गई। निकिता तपाक से बोली- “मुझे मालूम है दादाजी, आप सब लोग थोड़े-थोड़े बुद्धू भी हैं!… मैं फैसला कर दूँगी पर मुझे पचास रुपये तुरंत चाहिए!” – निकिता की बात से वर्मा जी को छोड़ सभी मनीषी साहित्यकार हैरान-परेशान हो गए।
वर्मा जी ने उसे पचास रुपये देकर पूछा- “इसका क्या करोगी बेटी?”
”मुझे अपनी सहेलियों को चॉकलेट खिलाना है!… वे मेरा इंतज़ार कर रही हैं। मैं दस मिनट में आती हूँ।” – इतना कहने के बाद निकिता फुर्र से उड़ गई!
सभी छह विद्वान असहज और असमंजस की स्थिति में थे। आज एक छोटी-सी लड़की ने प्रदेश के बड़े विद्वानों को ‘बुद्धू’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया और फुर्र से उड़ गई! प्रदेश के छह बड़े साहित्यकारों को एक साथ इतनी बड़ी मानद उपाधि से आज तक किसी ने सम्मानित नहीं किया था!
नानकुन टूरी गोटानी असन पेट।
कहाँ जाबे टूरी रतनपुर देश!
छत्तीसगढ़ी भाषा का यह एक सरल जनउला (पहेली) है, जिसका उत्तर है- चिट्ठी या पत्र। इस जनउला का जवाब नहीं दे पाने पर प्रतियोगी परीक्षा देने वाले बच्चों की जो स्थिति परीक्षा हॉल में हो सकती है, वैसी ही असहज स्थिति अभी सभी विद्वानों की हो गई थी।
”मेरी पोती की बातों का आप लोग बुरा न मानें… जब भी मैं किसी समस्या में फँस जाता हूँ, तब यही उसका हल निकालती है!” – वर्मा जी ने अपनी आवाज में मिश्री घोलते हुए विनम्रतापूर्वक कहा, मगर अब तो जैसे विद्वानों का गुस्सा फटना शुरू ही हो चुका था!
”अपनी पोती को कैसी शिक्षा दे रहे हैं वर्मा जी? हम जैसे विद्वानों को बुद्धू कहना कहाँ तक उचित है? कैसे संस्कार दिए हैं उसको?” – डॉ. त्रिमूर्ति ने अपने अहंकार पर मरहम-पट्टी लगाते हुए मानो मेजबान वर्मा जी के ऊपर गोली ही दाग दी! पुरस्कार चयन समिति की बैठक में अनजाने ही असहज स्थिति पैदा हो गई थी।
”अरे नहीं त्रिमूर्ति जी, बच्चों की बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए!” – फिर भी वर्मा जी के जवाब से विद्वान लोग बिलकुल भी संतुष्ट नहीं दिख रहे थे।
”कम से कम रामनाथ जैसे अकादमी सम्मान प्राप्त बुजुर्ग साहित्यकार का अपमान बर्दाश्त से बाहर है!” – त्रिमूर्ति जी ने अपनी भड़ास फिर निकाली।
वर्मा जी हाथ मलते हुए चुप बैठे थे। थोड़ी ही देर में निकिता दौड़ते हुए आई और विद्वानों से एक प्रश्न किया- “मैंने दोनों साहित्यकारों की कुछ कहानियाँ पिछली रात पढ़ी हैं, अच्छी कहानियाँ हैं। क्या यह सही है कि तीन सदस्य एक को और तीन सदस्य दूसरे को पुरस्कार देने के पक्ष में हैं?”
”मगर यह तुम्हें कैसे मालूम?” – एक सदस्य ने निकिता से प्रश्न किया।
”अगर ऐसा न होता तो आप लोग निर्णय ले चुके होते।” – निकिता ने जवाब दिया।
सभी विद्वान उसकी बातों से संतुष्ट दिखे। इसके बाद निकिता ने एक और प्रश्न किया- “इसका मतलब तो यही हुआ न कि दोनों के लेखन की गुणवत्ता समान है?”
चयन समिति के अध्यक्ष रामनाथ जी ने कहा- “हाँ, बिलकुल सही है। दोनों के लेखन की गुणवत्ता समान है।”
”मेरे पास आपकी समस्या को हल करने के तीन विकल्प हैं!” – निकिता ने कहा।
”कौन-कौन से तीन विकल्प?” – अध्यक्ष डॉ. रामनाथ ने पूछा।
”पहला विकल्प- वरिष्ठता के आधार पर जिनकी उम्र ज्यादा हो, उन्हें यह पुरस्कार दे दें!”
निकिता की बातों को सुनकर जूरी मेंबरों की दृष्टि अध्यक्ष रामनाथ जी के चेहरे पर टिक गई। वे निकिता की बातों से सहमत दिख रहे थे! तभी दीवान जी के एक भक्त जूरी मेंबर ने कहा- “यह तो दीवान जी के साथ सरासर अन्याय होगा! उम्र में वे छोटे ज़रूर हैं, परन्तु पुरस्कार के असली हकदार तो वही हैं!”
”और दूसरा विकल्प क्या है बेटी?”
”सिक्का उछालकर टॉस कर लें! यह सबसे सरल विकल्प है। जिनकी किस्मत अच्छी होगी, वे पुरस्कार पा जाएँगे। आप लोगों पर कोई दोषारोपण नहीं कर सकेगा!”
कमरे में सन्नाटा छा गया। पाँच मिनट तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर अध्यक्ष डॉ. रामनाथ ने कहा- “बेटी, तीसरा विकल्प क्या है?”
निकिता मुस्कुराई। वह बोली- “मैं जानती थी कि पहले दो विकल्पों पर आप सहमत नहीं होंगे। अब यह तीसरा और आखिरी विकल्प है, मगर इससे भी शायद आप लोग सहमत नहीं होंगे!” – निकिता ने बड़े आत्मविश्वास से कहा।
”वह क्यों बेटी? सहमत क्यों नहीं होंगे?”
”बुद्धिजीवियों के विचार मेंढकों की तरह होते हैं। उन्हें तौलना बड़ा कठिन है! क्योंकि वे तौलते समय तराजू से कूद पड़ते हैं!” – निकिता खिलखिलाकर हँसने लगी। उसे हँसता देखकर सभी साहित्यकार एक-दूसरे का मुँह देखकर हँसने लगे! यह उन सभी साहित्यकारों के ऊपर करारा व्यंग्य था, मगर कुछ हद तक सही भी था!
”ठीक है बेटी, अब तीसरा विकल्प बता दो।” – अध्यक्ष डॉ. रामनाथ ने कहा।
इसके बाद निकिता ड्राइंग रूम के कोने में रखे डिजिटल वजन मशीन को खींचकर बीच में ले आई और अपने मयारू दादाजी को आदेश दिया- “दोनों साहित्यकारों की पुस्तकों का वज़न करिए दादाजी!”
वर्मा जी ने पुस्तकों का वज़न किया तो डॉ. पाण्डेय की कुल 12 पुस्तकों का वज़न 6 किलो और डॉ. दीवान की 22 पुस्तकों का वज़न 6 किलो 200 ग्राम था। सभी विद्वान निकिता की कार्रवाई को ध्यानपूर्वक देख रहे थे और कुछ-कुछ समझने की कोशिश भी कर रहे थे।
इसके बाद निकिता दोनों साहित्यकारों की पुस्तकों को अलट-पलट कर देखने लगी और कुछ सोचने के बाद उसने घोषणा की- “पाण्डेय अंकल को पुरस्कार मिलना चाहिए!”
एक विद्वान ने प्रश्न किया- “बेटी, दीवान जी की पुस्तकों की संख्या ज्यादा है और वज़न भी 200 ग्राम ज्यादा है, फिर तो दीवान जी को ही यह पुरस्कार मिलना चाहिए!”
विद्वान साहित्यकार के प्रश्न के प्रत्युत्तर में निकिता ने प्रश्न किया- “अंकल, आप लोग पुरस्कार का फैसला क्यों नहीं ले पा रहे हैं?”
विद्वान ने कुछ सोचकर जवाब दिया- “बेटी, दोनों का लेखन एक समान गुणवत्तापूर्ण है, फैसला न होने का यही मुख्य कारण है!”
निकिता बोली- “पाण्डेय अंकल की पुस्तकों का फॉन्ट साइज छोटा है, जिसके कारण उनकी पुस्तकों में शब्द संख्या ज्यादा है! गुणवत्ता एक समान होने के कारण शब्द संख्या का ज्यादा होना ही पुरस्कार का आधार बनेगा!”
सभी विद्वान निकिता की तर्कशक्ति को देख आश्चर्यचकित थे। अब सबसे बड़े साहित्यकार रामनाथ जी के बोलने की बारी थी- “शाबाश बेटी! तुम सचमुच सरस्वती-सुता हो। हम सब तो केवल सरस्वती-सेवक हैं!… ज्ञान के साथ अहंकार भी फलता-फूलता है, इसीलिए फैसला लेने में चूक भी हो जाती है। तुम्हारी यह बात भी सही है कि विद्वान व्यक्ति थोड़े-थोड़े बुद्धू भी होते हैं!… तुम्हारा फैसला एकदम सही है बेटी… पुरस्कार पाण्डेय जी को मिलेगा!”
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डॉ. विनोद कुमार वर्मा
व्याकरणविद्, कहानीकार, समीक्षक
98263 40331
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