आधुनिक शिक्षा और भारतीय संस्कृति का संकट

प्रस्तावना

भारत की संस्कृति, संस्कार और परम्पराएँ हजारों वर्षों की तपस्या, अनुभव और सामाजिक प्रयोगों का परिणाम हैं। इन्होंने केवल एक सभ्यता का निर्माण नहीं किया, बल्कि ऐसे जीवन मूल्यों को जन्म दिया जिनके आधार पर परिवार, समाज और राष्ट्र की संरचना खड़ी हुई। माता-पिता का सम्मान, गुरु के प्रति श्रद्धा, संयुक्त परिवार व्यवस्था, विवाह की पवित्रता, संतानों के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व तथा समाज के प्रति कर्तव्यबोध भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं।

किन्तु पिछले कुछ दशकों में शिक्षा के नाम पर एक ऐसी मानसिकता विकसित हुई है जिसने परम्परा, संस्कृति और संस्कारों को प्रगतिशीलता के विरोधी तत्व के रूप में प्रस्तुत किया। अनेक शिक्षित वर्गों में यह धारणा निर्मित की गई कि जो जितना अधिक परम्पराओं का विरोध करेगा, वह उतना ही आधुनिक और बुद्धिजीवी माना जाएगा। परिणामस्वरूप समस्या शिक्षा की नहीं, बल्कि उस शिक्षा-दृष्टि की है जो अपनी जड़ों से कटकर पश्चिमी जीवन-पद्धति की अंधी नकल को ही प्रगति मान बैठी है।

संस्कृति विरोधी शिक्षा का प्रभाव

आज भारत में संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं। वृद्ध माता-पिता अपने ही घरों में उपेक्षा का जीवन जीने को विवश हैं। वृद्धाश्रमों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। अनेक मामलों में आर्थिक रूप से सम्पन्न संतानें भी अपने माता-पिता के प्रति उत्तरदायित्व निभाने से बचती दिखाई देती हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) तथा जनगणना के आँकड़े दर्शाते हैं कि परिवारों का आकार लगातार छोटा हुआ है। वहीं विभिन्न सामाजिक अध्ययनों में वृद्धावस्था में अकेलेपन और सामाजिक असुरक्षा की समस्या बढ़ने की पुष्टि हुई है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मूल्यगत परिवर्तन का भी संकेत है।

विवाह और परिवार संस्था पर प्रभाव

भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का पवित्र बंधन माना गया है। वर्तमान शिक्षा और मनोरंजन उद्योग के प्रभाव में विवाह को अक्सर केवल व्यक्तिगत सुविधा या विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

परिणामस्वरूप विवाह की आयु लगातार बढ़ रही है, अविवाहित रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है तथा जन्मदर में उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है। अनेक युवा पारिवारिक उत्तरदायित्व को जीवन की बाधा मानने लगे हैं। यह दृष्टिकोण भारतीय जीवन-दर्शन से भिन्न है, जहाँ परिवार को व्यक्ति के विकास का आधार माना गया है।

संस्कृति बनाम रूढ़िवादिता का भ्रम

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हर परम्परा रूढ़िवादिता है?

उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

रूढ़ियाँ वे हैं जो तर्क, न्याय और मानवीय गरिमा के विरुद्ध हों। किन्तु माता-पिता का सम्मान, गुरु का आदर, परिवार के प्रति उत्तरदायित्व, विवाह संस्था की पवित्रता, समाज के प्रति कर्तव्य और संतानों का संरक्षण—ये रूढ़ियाँ नहीं, बल्कि सभ्यता के आधारभूत मूल्य हैं।

दुर्भाग्य से आधुनिक शिक्षा के कुछ प्रभावशाली वर्गों ने इन मूल्यों को भी पिछड़ेपन की श्रेणी में रख दिया। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने के बजाय उससे दूरी बनाने की प्रेरणा मिलने लगी।

वास्तविक समस्या क्या है?

समस्या भारतीय संस्कृति, संस्कार और परम्पराएँ नहीं हैं। समस्या शिक्षा व्यवस्था का वह स्वरूप है जो व्यक्ति को केवल रोजगार प्राप्त करने की मशीन बनाता है, लेकिन उसे कर्तव्य, संवेदना, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं सिखाता।

आज का शिक्षित व्यक्ति तकनीकी रूप से दक्ष हो सकता है, किन्तु यदि वह अपने माता-पिता के प्रति संवेदनशील नहीं है, परिवार की महत्ता नहीं समझता, समाज के प्रति उत्तरदायित्व नहीं निभाता, तो उसकी शिक्षा अधूरी है।

निष्कर्ष

भारत को संस्कृति-विरोधी नहीं, संस्कृति-समर्थक शिक्षा की आवश्यकता है। ऐसी शिक्षा जो विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ संस्कार, नैतिकता, कर्तव्यबोध और भारतीय जीवन मूल्यों का भी विकास करे।

समाज की वर्तमान अनेक समस्याओं का समाधान संस्कृति, संस्कार और परम्पराओं को समाप्त करने में नहीं, बल्कि उन्हें आधुनिक संदर्भों में पुनर्स्थापित करने में है। हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारी परम्पराएँ ही हमारे जीवन-मूल्य हैं। इन्हीं के संरक्षण में व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण निहित है। भारतीय संस्कृति का समर्थन करना रूढ़िवादिता नहीं, बल्कि मानवीय धर्म का पालन करना है।

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