दस बरस की अंशु की छुट्टियाँ चल रही थी। आज शुक्रवार का दिन था। महीने का आखिरी तारीख भी। पापा आफिस जाने के लिए निकल ही रहे थे कि अम्मा ने कहा- ‘ वापसी में कुछ सब्जी लेते आना। ‘
पापा ने मम्मी की बात को अनसुना कर दिया। उसी समय अंशु दौड़कर पापा के पास आई और अपने एक हाथ को फैलाकर बोली- ‘ पापा पैसे? आज मैं पचास रूपये लूँगी। मुझे दो सहेलियों को भी गुपचुप खिलाना है!’
‘ बेटा, बीस रूपया ले लेना। ‘
‘ नहीं पापा, पचास ही लूँगी। सहेलियों के सामने मेरी कोई इज्जत है कि नहीं? मैंने उन्हें बोल रखा है! ‘
‘ ठीक है। ‘
पापा ने पीछे पाकिट में हाथ डाला। वहाँ पर्स नहीं था।
‘ बेटा, पर्स आलमारी में रह गया है। उसे ले आना तो जरा। ‘
अंशु दौड़कर गई। पापा की आलमारी से पर्स निकालकर उसे खोलकर देखा तो उसमें केवल पचास रूपया ही था। उसे ध्यान आया कि पापा के बस से आने-जाने का टिकट तीस रूपया लगता है। शेष बीस रूपया में एक-आध बार चाय पियेंगे।
‘ ओह आज तो महीने का आखिरी तारीख है! पापा मुझे पैसा कहाँ से देंगे! ‘ – अंशु की आँखे भर आई। उसने अपने आँसू पोछते-पोछते अपना मिट्टी का गुल्लक तोड़ा और उसमें जितने भी नोट थे उसे पापा के पर्स में भर दिया। इसके बाद वह पापा को पर्स देकर तुरन्त वापस आ गई और टूटे गुल्लक के टुकड़ों को बीनने लगी।
पापा ने पर्स खोलकर देखा और नोटों की गिनती करने के बाद अंशु की अम्मा से बोला- ‘ तुमने मेरे पर्स में एक सौ बीस रूपया और डाला है क्या? ‘
‘ नहीं तो! ‘
पापा तुरन्त कमरे के भीतर लौटे। उन्होंने देखा कि अंशु टूटे गुल्लक के टुकड़ों को इकट्ठा कर रही है। वे सब कुछ समझ गये और लगभग दौड़ते हुए अंशु के पास गये। अंशु ने जैसे ही पापा को अपने पास पाया वह उनसे लिपट गई और रोते-रोते बोली- ‘ पापा! आपने मुझे क्यों नहीं बताया कि आपका पैसा खत्म हो गया है! मेरे गुल्लक में पैसा तो था न! ‘
-डॉ. विनोद कुमार वर्मा
व्याकरणविद्,कहानीकार, समीक्षक
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