काव्य श्रृंखला :
सांध्य दीप भाग-17
-डॉ. अशोक आकाश

/71/
कुछ तो पेट की आग बुझाने,
खतरा झेलते मर जाते |
कठिन परिश्रम करके कुछ,
तारों से बातें कर जाते ||
कुछ जॉबाज हुए हैं जो,
शेरों से भी लड़ जाते |
कुछ गीदड़ से हाथ मिलाकर,
सुख से आगे बढ़ जाते ||
होती जीवन आसान सफर |
फूलों से मिलती जीत अगर ||
अंधी गलियों में गुम होता,
छोड़ चुके जीवन रण जो |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/72/
दो मुट्ठी ही अन्न के लिये,
खतरा झेलते जीते हैं |
बन जाता नासूर जखम,
जीवन भर रोते सीते हैं ||
बच्चों के सपने टूट गये,
मॉ बाप पे क्या क्या बीते हैं |
बूढ़ी ऑखें थर थर शाखें,
यादों को घोलते पीते हैं ||
कुम्हलाती फूलों की ताज |
बेसुध सी होती आवाज ||
मुक्त हो गया सब बंधन से,
जूझ लड़े जीवन रण जो |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/73/
हिम्मतवाले नही घबराते,
दृढ़ ऑधी तूफान हो |
जीवन झंझा विप्लव संझा,
महाप्रलय ऊफान हो ||
बजे मृदंगा उठे तरंगा,
नित गंगा स्नान हो |
पुण्य सलिल डूबे मन चंगा,
अखिल विश्व गुणगान हो |
कोयल सी गूंजे मृदुगान |
नित पायल खनके पग प्राण ||
दीप जरे मन प्रीत भरे,
जंग जीत वरे वधु के मन को |
अंधकार में भटके हैं जो ,
कर उज्जवल उनके तम को ||
/74/
खुद को बचाते दुनिया में,
लड़ते ऑधी तूफान से |
इंसॉ को सबसे ज्यादा डर,
रहता है इन्सान से ||
है जो इंसानियत के दुश्मन,
एक दूजे को काट रहे |
आगे बढ़ जाने की होड़ में,
धर्म जाति में बॉट रहे ||
कर्मनिष्ठ कर्तव्य तपन कर,
है जीवन अनमोल रतन |
गहन तिमिर अरि ज्योतिर्मय कर,
तोड़ें हर सीमांकन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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,वो दौलत क्या जो जल जाये,
गल जाये बौछारौं से |
ऐसा रत्न कमा लो ,
गूंजे नाम तेरे जयकारों से ||
उनकी क्या औकात पल-पल,
घिरे हुए चटुकारों से |
बघमारों से बच जाये,
बचना मुश्किल बटमारों से ||
जीवन पथ पर चलो सतर्क |
जीत सका क्या कभी कुतर्क ||
स्वस्थ रहोगे ध्यान रखो तन,
स्वच्छ रखो मन कुंदन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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/18/
ज्ञानी जन द्रूत चढ़ते सूरज,
कभी अनदेखा नहीं करते |
सुबह का स्वागत हँसकर करते,
सूर्य ढला तो नही डरते ||
स्वयं प्रकाशित दृढ़ अनुशासित,
स्वर्ण सफलता नित वरते |
ज्ञानदीप जले अंतस जिसके,
जग के विघन तमस हरते ||
धारण कर लो दुःख दरपन |
कर दुखियों पे सुख अर्पण ||
कभी तो पूर्णिम स्वर्णिम आभा से
दमकाते जन जन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्ज्वल उनके तम को ||
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/77/
गलकर अंकुरित बीज हमें,
जीवन की कला सिखाते |
क्षण क्षण बढ़ता आसमान तक,
गौरव हम पे लुटाते ||
पीढ़ियों से दृढ़ ऑगन में,
पुरखों सा प्रेम बहाते |
सोंख सूर्य का अंगारा,
नित शीतलता बरसाते ||
पेड़ धरा के आभूषण |
सौभाग्यवती जस नारी गण ||
एहसान भुला नर नर्तन कर,
वृक्षों के कॉटे गरदन को |
अंधकार में भटके हैं जो,
कर उज्जवल उनके तम को ||
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-डॉ. अशोक आकाश
अद्भुत सृजन गुरुदेव