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‘‘श्री सत्यनारायण कथा‘ अपने पॉंच अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में प्राप्य थी इसे हिन्दी काव्य रूपांतर में प्रस्तुत कर रमेशकुमार सिंह चौहान ने सहज हिन्दी के काव्य शास्त्रीय छन्द में उपलब्ध कराकर हिन्दी साहित्य के एक कमी को पूरा करने की जीवंत कोशिश की है ।
‘स्कन्धपुराण‘ में सत्यनारायण की व्रत कथा ‘रेवाखण्ड़‘ के नाम से प्रसिद्ध पॉंच या सात खंड़ों में मिलता है । इस तरह एक कथा ‘भविष्य पुराण‘ में छः अध्यायों में पढ़ी जाती है । रमेश चौहान ने ‘सत्यनारायण कथामृत‘ को पांच अध्याय प्रस्तुत किया है ।
‘सत्यनारायण कथमृत‘‘ के आध्यात्मिक शब्द कैनवास में रमेश चौहान ने जो इन्द्रधनुषी भावों के रंग भरे हैं वे ईश्वरीय आस्था के प्रतीक हैं ।
Description
‘‘सारे तीरथ बार बार-गंगासागर एक बार‘‘ और ‘‘धर्म करे धन नाही घटे‘‘ सामाजिक जीवन परिवेष की कथायें हैं जिनके साथ कोई न कोई कथा जुड़ी हुई है। मनु स्मृति में सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग की कल्पना की गई है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल या वीरगाथा काल के बाद हिन्दी साहित्य इतिहास के स्वर्णकाल ‘‘भक्तिकाल‘‘ का आरंभ होता है -तुलसीदास का ‘‘रामचरितमानस‘‘ और कबीर की ‘साखी, सबद रमैनी‘ इसी भक्तिकाल की देन है जिसमें ईश्वर तक पहुँचने के कठिन और सरल मार्ग साधनायें वर्णित हैं ।
महाकवि और छत्तीसगढ़ के जनमानस में रचबस गयें तुलसीदास ने इतिहास के एक मोड़ पर ईष्वर के इस धरती पर अवतरित होने का विश्वास व्यक्त किया है –
जब जब होय धर्म की हानि,
बढ़ैं अधर्म असुर अभिमानी ।
तब तब प्रभु धर मनुज शरीरा,
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।
कुछ इस तरह का ही एक प्राचीन विश्वास ‘‘श्री सत्यनारायण कथा‘‘ में है कि ‘मृत्युलोक‘ (पृथ्वी) पर सत्यनारायण की कथा में व्रत कर्ता के जीवन में सुख समृद्धि, मानसिक शांति और जीवन के कष्ट-क्लेश मिट जाते हैं।
‘‘श्री सत्यनारायण कथा‘ अपने पॉंच अध्यायों में संस्कृत के श्लोकों में प्राप्य थी इसे हिन्दी काव्य रूपांतर में प्रस्तुत कर रमेशकुमार सिंह चौहान ने सहज हिन्दी के काव्य शास्त्रीय छन्द में उपलब्ध कराकर हिन्दी साहित्य के एक कमी को पूरा करने की जीवंत कोशिश की है ।
‘‘तीरथ चालै दोऊ झन, चित्त चंचल मन चोर‘‘-कबीर दास के इस ‘‘चंचल चित और ईश्वरर स्मरण से मन चुराने वाले‘‘व्यक्ति को ‘श्रीसत्यनारायण कथा‘‘ की कथा नयी सम्पती, नया परिवेश, उत्पन्न तनाव से अलग मानसिक शांति और भावी पीढ़ियों के सुख समृद्धि के साथ सत्कर्म के साथ जीवन मिलने का विश्वास है ।
‘सत्यमेव जयति नानृतम‘ सत्य सर्वदा विजयी होता है, असत्य हारता है, दुखी पीड़ित होता है । निर्धन ब्राहमण सत्य के संकल्प को पूरा करता है, लकड़हारा सत्य का अन्वेशण पूरा करता है, साधु वणिक, और दामाद असत्य आचरण से जेल जाकर वापस लौटते है और जब सत्य संकल्प से जुड़ाव होता है- इतिहास सुख लोटता है ।‘
‘स्कन्धपुराण‘ में सत्यनारायण की व्रत कथा ‘रेवाखण्ड़‘ के नाम से प्रसिद्ध पॉंच या सात खंड़ों में मिलता है । इस तरह एक कथा ‘भविष्य पुराण‘ में छः अध्यायों में पढ़ी जाती है । रमेश चौहान ने ‘सत्यनारायण कथामृत‘ के पहले अध्याय में ‘कष्टहरण’ छोटी रीति का रूपायन किया है –
व्रत सत्यनारायण सम नहिं । और व्रता दूजा जग पर कहिं
सकल क्लेश के नाशनहारी । भाग्य विधाता मंगलकारी
दूसरे अध्याय में
‘काशी नामक पुरी सुहावन । रहे जहां इक दीन ब्राह्मण
सदानंद रहे नाम उनका । क्लेश कष्ट से नाता जिनका
के कष्ट दूर करने के काव्य दृश्य है । तीसरे चौथे अध्याय में ‘सत्य‘ की श्रृंखला बीतते जीवन में अपनाने पर साधु वणिक, पत्नि लीलावती, पुत्री कलावती, और दामाद के श्रृंखलाबद्ध कष्टों का वर्णन है जो ‘सत्यनारायण कथा‘ के परायण के सूरज से दुखों का अंधेरा भागने का सहज रसमय काव्य शब्दांकन है । पांचवे अध्याय में ‘गोप ग्वाल जन‘ की सत्यनारायण कथा का प्रसाद, शिकार खेलने गये राजा तुंगध्वज ने राजा होने के मान से ग्रहण नही किया और राजधानी में वापस लौटने पर –
राजा निज घर लौट के, देख रहे भौचक्क।
नष्ट हुये सौ पुत्र सब, गया हृदय तब धक्क।।
लौट कर राजा तुंगध्वज ने गोप ग्वाल जन से प्रसाद ग्रहण किये और राजा का पुराना इतिहास सुख वापस लौटा ।
पाँचवें अध्याय के अंत में ‘कथामृत‘ में आये आध्यात्मिक पात्रों के पुनर्जन्म में लोक कथाओं के इतिहास लोक पात्रों के रूप में जन्म लेकर नया इतिहास रच जाने की अमर कथयें हैं –
पूर्वकाल में भक्त जो, किये कथा उपवास।
अपने अगले जन्म में, बने देव की दास।।
सतानंद थे जिनके नामा । अग्र जन्म वह भये सुदामा
कृष्ण मित्र वह जग विख्याता । पावन भक्ति कृष्ण का पाता
निर्धन वह भिल्ल लकड़हारा । गुहा नाम जाने संसारा
जो श्री रामहिं चरण पखारे। जब गंगा तट राम पधारे
उल्कामुख नामित वह राजा । भये अयोध्यापुर के राजा
रंगनाथ की पूजन कीन्हा । परम मोक्ष पद को वह लीन्हा
‘सत्यनारायण कथमृत‘‘ के आध्यात्मिक शब्द कैनवास में रमेश चौहान ने जो इन्द्रधनुषी भावों के रंग भरे हैं वे ईश्वरीय आस्था के प्रतीक हैं । छत्तीसगढ़ में वर्तमान में ‘सत्यनारायण‘ की कथा परायण के बाद कहीं कहीं रामायण गायन का अनिवार्य आयोजन किया जाता है ।
कृष्ण कुमार भट्ट ‘पथिक‘
अध्यक्ष जिला शाखा,
हिन्दी साहित्य परिषद,
सेवानिवृत्त प्राचार्य मुंगेली, छ.ग.
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